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: कुंडलपुर का यही प्रांगण हमारे विद्याभ्यास की पाठशाला रही, निर्यापक मुनि श्री नियमसागर जी महाराज

Aditi News Team

Mon, Apr 8, 2024
कुंडलपुर का यही प्रांगण हमारे विद्याभ्यास की पाठशाला रही निर्यापक मुनि श्री नियमसागर जी महाराज कुंडलपुर दमोह ।सुप्रसिद्ध जैन तीर्थ सिद्धक्षेत्र कुंडलपुर में आचार्य भक्ति के पश्चात निर्यापक श्रमण मुनि श्री नियमसागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए बताया यहां कुंडलपुर क्षेत्र में आने के पश्चात ऐसी नवीनतम अनुभूति हो रही है यहां आने के बाद ऐसा लगा इतने सारे मुनि महाराज के बीच कभी नहीं आए। 76--77 में दो चातुर्मास गुरुवर के साथ कुंडलपुर में किये ।हम 4 ही जन क्षुल्लक थे। सन् 75में फिरोजाबाद चातुर्मास के बाद सोनागिर सिद्ध क्षेत्र आए आचार्य श्री के साथ चार-पांच ब्रह्मचारी थे एक क्षुल्लक जी थे ।आचार्य श्री ने सोनागिर में चारों ब्रह्मचारियों को छुल्लक दीक्षा प्रदान की। हम क्षुल्लक दीक्षा को क्षुल्लक व्रत कहते हैं ।दीक्षा का तात्पर्य जहां रत्नत्रय धर्म प्रकट हो जाता अंतरंग परिग्रह का त्याग हो जाता। दक्षिण कर्नाटक को छोड़कर पढ़ाई बीच में रोक कर चले आए ।निमित्त मिलता है दिगंबर गुरुओं का लौकिक शिक्षा की ओर मन था ,प्रवचन अच्छे लगने लगे। राजस्थान के सुप्रसिद्ध नगर किशनगढ़ में गुरु को गुरु मिले अपने गुरु हमको वही मिले जहां हमारे गुरु को गुरु मिले वहां हमको हमारे गुरु प्राप्त हो गए। जब गुरु का प्रथम दर्शन किया। छोटी उम्र में कोई दीक्षा लेते नहीं थे ऐसी छोटी उम्र में ही रत्नात्रय धर्म के मार्ग पर आचार्य श्री ज्ञान सागर जी ने चला दिया ।हमारी उम्र भी दूसरी तीसरी कक्षा पढ़ते थे लौकिक पढ़ाई चलती रही 18 साल की उम्र में क्षुल्लक दीक्षा के साथ कुंडलपुर में दो चातुर्मास 76 एवं 77 में गुरु जी के सानिध्य में हुये ।एक छोटे बालक के रूप में विद्या अध्ययन करते थे चार लोग थे इसी प्रांगण में बैठकर मुलाचार प्रदीप का अध्ययन किया यही प्रांगण हमारे विद्याभ्यास की पाठशाला रही ।जब उस मंदिर में जाते गुरु नजर आते बड़े बाबा के साथ छोटे बाबा और अपनी तुलना करते वह दृश्य घूमने लगता। पुनः वह दिन नहीं आ सकते अतीत का लौटाना किसी के वश की बात नहीं ।अतीत व्यतीत हो जाता अतीत को याद करना और उस घटना को सुनाना संस्मरण कहते है। हम चार ही जन क्षुल्लक थे आचार्य श्री ने बुंदेलखंड में इतने बड़े संघ की रचना की ।गुरु चरणों तक पहुंचने की आश थी कर्मों के रहस्य को कोई नहीं जान सकते ।अविराम रूप से 30-30 किलोमीटर रोज चले 6 दिन पहले ही निकल सकते। बड़े-बड़े ज्योतिष भविष्य को नहीं बता सकते गुरु से प्रार्थना करते और कितना चलना पड़ेगा परोक्ष में प्रत्यक्ष अनुभूति करता रहा कोई संकेत प्राप्त हो गुरु दर्शन हो सके।

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