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त्याग में आसक्ति और अहंकार छोड़ना जरूरी : मुनि श्री समतासागर जी

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बादल की तरह बरसें, समुद्र की तरह संग्रह न करें : त्याग में आसक्ति और अहंकार छोड़ना जरूरी : मुनि श्री समतासागर जी

Aditi News Team

Wed, Sep 23, 2026

बादल की तरह बरसें, समुद्र की तरह संग्रह न करें, त्याग में आसक्ति और अहंकार छोड़ना जरूरी : मुनि श्री समतासागर जी को

कुण्डलपुर(म.प्र.)। दशलक्षण महापर्व का प्रत्येक दिन साधक को आत्ममंथन और जीवन में परिवर्तन की प्रेरणा दे रहा है। उत्तम त्याग धर्म के अवसर पर निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कहा कि त्याग केवल वस्तु छोड़ने का नाम नहीं, बल्कि आसक्ति, संग्रह और अहंकार को छोड़ने का नाम है। मनुष्य जीवन में जितना ग्रहण जरूरी है, उतना ही छोड़ना भी आवश्यक है। त्याग ही जीवन को हल्का, स्वस्थ और सार्थक बनाता है।

मुनि श्री ने कहा कि पर्व समाज को जोड़ने और व्यक्ति के भीतर समता का भाव जगाने का माध्यम हैं। संस्कृत में पर्व का अर्थ संधि, गांठ या पोर भी माना गया है। जिस प्रकार गन्ने के पोर उसके भीतर के रस को जोड़े रखते हैं, उसी प्रकार पर्व समाज को जोड़ने का कार्य करते हैं। धार्मिक, सामाजिक, राष्ट्रीय और सांस्कृतिक पर्वों के माध्यम से समाज में समरसता तथा साधक के भीतर समता का भाव विकसित होता है। पर्व की आत्मा को समझकर जीवन में उतारना ही पर्व मनाने का वास्तविक उद्देश्य है।

उन्होंने कहा कि प्रकृति स्वयं त्याग का संदेश देती है। पेड़ पर पत्ते आते हैं और समय आने पर झड़ जाते हैं, फल लगते हैं और पककर गिर जाते हैं। गाय भी समय आने पर अपना दूध छोड़ती है। शरीर से अनावश्यक पदार्थ बाहर निकलता है तो व्यक्ति स्वस्थ और ताजा अनुभव करता है। जिस प्रकार सांस लेना जरूरी है, उसी प्रकार सांस छोड़ना भी जरूरी है। इससे स्पष्ट है कि त्याग जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया है और त्याग ही धर्म है।

संग्रह नहीं, सदुपयोग बने जीवन का संस्कार

मुनि श्री ने कहा कि राग और आसक्ति के कारण मनुष्य बाहरी वस्तुओं का संग्रह करता चला जाता है। कई बार व्यक्ति ऐसी वस्तुएं भी अपने पास रोककर रखता है, जिनकी उसे जरूरत नहीं होती, लेकिन कोई जरूरतमंद मांगने आए तो देने को तैयार नहीं होता। वस्तु को पकड़कर रखने की यही मानसिकता परिग्रह है। परिग्रह व्यक्ति के पतन और अशांति का कारण बन सकता है।

उन्होंने कहा कि जीवन में कम से कम में काम चलाने की आदत विकसित करनी चाहिए। आवश्यकता को आवश्यकता तक सीमित रखें और अनावश्यक वस्तुओं तथा विलासिता से बचें। यदि किसी वस्तु की आवश्यकता से अधिक उपलब्धता है तो विचार करें कि उसका उपयोग जनहित में कैसे किया जा सकता है। अतिरिक्त वस्तु को किसी जरूरतमंद के काम में लगाना त्याग की दिशा में सार्थक कदम है।

बादल और समुद्र का उदाहरण देते हुए मुनि श्री ने कहा कि समुद्र में अथाह पानी है, लेकिन वह खारा है, जबकि बादलों के पास सीमित जल होता है और वे उसे रोककर नहीं रखते। बरसकर वही जल धरती में हरियाली, जीवन में खुशहाली और वातावरण में शीतलता लाता है। इसी प्रकार मनुष्य के पास धन, ज्ञान और सामर्थ्य जितना भी हो, उसकी सार्थकता उसे रोककर रखने में नहीं, बल्कि उसके सदुपयोग में है।

उन्होंने कहा कि पुरुषार्थ और पुण्य से अर्जित धन को सुरक्षित रखना गलत नहीं है, लेकिन दृष्टि यह होनी चाहिए कि श्रेष्ठ अवसर आने पर उसका उपयोग धर्म, समाज और जनहित में किया जाएगा। मंदिर निर्माण, प्रतिमा विराजमान, पंचकल्याणक, धार्मिक विधि-विधान, संस्कार शिविर, पाठशाला या गौशाला जैसे कार्यों में सेवा का अवसर मिले तो व्यक्ति को आगे बढ़कर सहयोग करना चाहिए।

दान में प्रदर्शन नहीं, समर्पण जरूरी

मुनि श्री ने कहा कि इतिहास में अनेक दानवीर हुए हैं, जिन्होंने अपनी सामर्थ्य को बड़े उद्देश्यों के लिए समर्पित किया। समाज में आज भी ऐसे लोग हैं जो बिना प्रचार और पहचान की अपेक्षा के धर्म और समाज के कार्यों में अपना द्रव्य लगाते हैं। आचार्य श्री की कृपा से भी ऐसे अनेक श्रद्धालु सामने आए, जिन्होंने बिना नाम की अपेक्षा के बड़े धार्मिक कार्यों में योगदान दिया। दान का महत्व प्रदर्शन में नहीं, समर्पण की भावना में है।

उन्होंने कहा कि पर्युषण और दशलक्षण पर्व के दौरान अनेक व्यापारी और नौकरी-पेशा लोग अपनी व्यस्तताओं से समय निकालकर परिवार सहित धर्मध्यान कर रहे हैं। धर्म के लिए समय निकालना भी त्याग है। जीवन में संकल्प लेकर उसे पूरा करना और परिवार को भी धर्म से जोड़ना त्याग की भावना को संस्कार में बदलने का माध्यम है।

धन, ज्ञान और शक्ति का सदुपयोग हो

मुनि श्री ने धन, ज्ञान और बल को तीन महत्वपूर्ण शक्तियां बताते हुए कहा कि इनका मूल्य इनके सदुपयोग से है। ज्ञान हो तो उसका उपयोग समाज के हित में किया जाए, धन हो तो दान और सहयोग में लगाया जाए तथा शक्ति हो तो दूसरों की रक्षा के लिए उसका उपयोग किया जाए। इनका दुरुपयोग विवाद, अहंकार और दूसरों को पीड़ा देने का कारण बन सकता है।

उन्होंने विशेष रूप से कहा कि त्याग का भी अहंकार नहीं करना है, बल्कि अहंकार का ही त्याग करना है। थोड़ा ज्ञान प्राप्त होते ही यदि व्यक्ति ज्ञान का अहंकार करने लगे तो वही ज्ञान उसके पतन का कारण बन सकता है। वास्तविक ज्ञान अपने भीतर बचे अहंकार को पहचानने और उससे मुक्त होने में है।

मुनि श्री ने कहा कि उत्तम त्याग धर्म वस्तु छोड़ने की मात्र शिक्षा नहीं देता, बल्कि संग्रह की मानसिकता, आसक्ति, अनावश्यक उपभोग और अहंकार छोड़ने की साधना सिखाता है। जब व्यक्ति अपनी आवश्यकता सीमित करता है, अतिरिक्त को जनहित में लगाता है, धन का दान करता है, ज्ञान बांटता है और अपनी शक्ति से दूसरों की रक्षा करता है, तभी त्याग जीवन का संस्कार बनता है।

प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्रीय प्रचार मंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने प्रेसनोट जारी कर बताया कि दशलक्षण महापर्व के दौरान कुण्डलपुर में धर्म, साधना, स्वाध्याय एवं विविध धार्मिक आयोजनों के माध्यम से श्रद्धालु उत्तम त्याग धर्म की भावना को जीवन में उतारने का संकल्प ले रहे हैं। इस अवसर पर ऐलकश्री आगतसागर महाराज ने भी संबोधित किया। ऐलक श्री चैत्यसागर जी महाराज ने तत्वार्थ सूत्र के आठवें अध्याय की व्याख्या की। संगीतमय महाआरती का आयोजन किया गया। 25 सितंबर अनंत चतुर्दशी के अवसर पर जैन धर्म के बारहवें तीर्थंकर भगवान श्री वासुपूज्य जी के मोक्ष कल्याणक महोत्सव पर अत्यंत भक्ति भाव से निर्वाण लाडू अर्पित किया जाएगा। दोपहर में शिखर मंदिर से श्रीजी को विमान में विराजमान कर मुनि संघ के सानिध्य में गाजे-बाजे के साथ भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी। शोभायात्रा कुण्डलपुर नगर भ्रमण करती हुई शिविर पंडाल पहुंचेगी, जहां धार्मिक कार्यक्रमों के साथ जलविहार का आयोजन संपन्न होगा।

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अदिति न्यूज,(सतीश लमानिया)

मुनि श्री समतासागर जी महाराज

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