क्या हम सचमुच निरपेक्ष हैं?
(राजनीति, समाज, मीडिया और व्यक्ति की चेतना पर आलेख)
मनुष्य स्वयं को कितना भी निष्पक्ष घोषित कर ले, उसकी दृष्टि पूरी तरह शून्य नहीं होती। उसके विचारों की मिट्टी परिवार तैयार करता है, शिक्षा उसे आकार देती है, समाज उसे दिशा देता है और मीडिया उसकी सोच को निरंतर प्रभावित करता रहता है। इसलिए हर व्यक्ति किसी न किसी वैचारिक धरातल पर खड़ा होता है। प्रश्न यह नहीं है कि हम किसी पक्ष में हैं या नहीं, बल्कि यह है कि हमारा पक्ष सत्य, विवेक और लोकहित पर आधारित है या केवल भावनाओं, प्रचार और पूर्वाग्रह पर।
आज का भारत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। किसी चुनाव का परिणाम आए, संसद में कोई नया विधेयक प्रस्तुत हो, किसी राज्य में हिंसा हो, न्यायालय का कोई महत्वपूर्ण निर्णय आए या कोई राष्ट्रीय योजना घोषित हो, समाज का बड़ा वर्ग बिना तथ्य पढ़े ही दो हिस्सों में बँट जाता है। एक पक्ष बिना आलोचना के समर्थन करता है, दूसरा बिना परीक्षण के विरोध। विचारों की जगह पहचान अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
हाल के वर्षों में अनेक राष्ट्रीय मुद्दों पर यह प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई दी। समान नागरिक संहिता, जनगणना, जातिगत सर्वेक्षण, महिला आरक्षण, कृषि सुधार, नई शिक्षा नीति, डिजिटल निगरानी, सोशल मीडिया नियंत्रण, पर्यावरणीय परियोजनाएँ तथा विभिन्न राज्यों में कानून व्यवस्था जैसे विषयों पर समाज का बड़ा हिस्सा पहले अपना राजनीतिक पक्ष तय करता है, उसके बाद तथ्यों की तलाश करता है। जबकि स्वस्थ लोकतंत्र में प्रक्रिया इसका उलटा होनी चाहिए।
व्यक्ति की मान्यताएँ जन्म से नहीं आतीं। बचपन में परिवार जिन मूल्यों को स्थापित करता है, वही आगे चलकर उसकी राजनीतिक और सामाजिक समझ का आधार बनते हैं। यदि घर में संवाद, प्रश्न और तर्क की संस्कृति है तो व्यक्ति असहमति का सम्मान करना सीखता है। यदि घर में केवल एक विचार को अंतिम सत्य घोषित कर दिया जाता है तो वही प्रवृत्ति आगे समाज में भी दिखाई देती है।
मीडिया आज विचार निर्माण की सबसे बड़ी शक्ति बन चुका है। समाचार चैनल, डिजिटल पोर्टल और सोशल मीडिया मंच केवल सूचना नहीं देते, वे दृष्टिकोण भी निर्मित करते हैं। सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म हमें वही सामग्री बार-बार दिखाते हैं जिससे हम पहले सहमत रहे हैं। परिणाम यह होता है कि हम धीरे-धीरे एक "विचार-कक्ष" में कैद हो जाते हैं जहाँ हमें केवल अपनी ही आवाज़ सुनाई देती है। विरोधी मत शत्रु जैसा प्रतीत होने लगता है।
सामाजिक जीवन में भी यही स्थिति दिखाई देती है। किसी धार्मिक आयोजन, भाषा विवाद, क्षेत्रीय अस्मिता, आरक्षण, लैंगिक समानता, पर्यावरण संरक्षण या सांस्कृतिक परंपराओं पर चर्चा होते ही लोग पहले अपनी पहचान के आधार पर खड़े हो जाते हैं। संवाद का स्थान आरोप ले लेते हैं और तर्क की जगह भावनाएँ हावी हो जाती हैं।
क्या किसी पक्ष में खड़ा होना गलत है? बिल्कुल नहीं। यदि कोई पक्ष संविधान, न्याय, मानवीय गरिमा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सामाजिक समरसता और लोककल्याण की रक्षा करता है, तो उसके समर्थन में खड़ा होना नागरिक धर्म भी हो सकता है। इतिहास में महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव आंबेडकर, जयप्रकाश नारायण और अनेक सामाजिक सुधारकों ने अन्याय के विरुद्ध स्पष्ट पक्ष लिया था। वे निरपेक्ष दर्शक नहीं थे, बल्कि न्याय के पक्षधर थे।
समस्या तब उत्पन्न होती है जब व्यक्ति अपने प्रिय नेता, दल, विचारधारा, जाति या समुदाय को त्रुटिहीन मानने लगता है। लोकतंत्र व्यक्ति-पूजा पर नहीं, विचार-विमर्श पर चलता है। यदि हम अपने समर्थित पक्ष की गलतियों पर भी मौन रहें और विरोधी पक्ष के प्रत्येक कार्य में केवल दोष खोजें, तो यह लोकतांत्रिक चेतना नहीं, वैचारिक आसक्ति है।
वर्तमान समय में हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि सोशल मीडिया ने त्वरित प्रतिक्रिया की संस्कृति विकसित कर दी है। अब अध्ययन कम और टिप्पणी अधिक होती है। लोग समाचार से अधिक उसकी हेडलाइन पढ़ते हैं, तथ्य से अधिक फ़ॉरवर्ड संदेशों पर विश्वास करते हैं और विश्लेषण से अधिक वायरल वीडियो से अपनी राय बना लेते हैं। ऐसी स्थिति में निष्पक्षता और भी कठिन हो जाती है।
वास्तविक निरपेक्षता का अर्थ यह नहीं कि हर विषय पर मौन रहा जाए या सही और गलत को समान मान लिया जाए। निष्पक्षता का अर्थ है कि हम तथ्य देखें, प्रमाणों का सम्मान करें, अपने प्रिय विचारों की भी समीक्षा करें और यदि सत्य हमारे पूर्व विश्वासों के विपरीत हो तो उसे स्वीकार करने का नैतिक साहस रखें।
आज देश को ऐसे नागरिकों की आवश्यकता है जो व्यक्ति नहीं, सिद्धांत के समर्थक हों; नारे नहीं, तर्क सुनें; भीड़ नहीं, विवेक का अनुसरण करें। लोकतंत्र तभी परिपक्व होगा जब नागरिक किसी दल या विचारधारा के स्थायी समर्थक बनने के बजाय सत्य, न्याय और संवैधानिक मूल्यों के स्थायी पक्षधर बनेंगे।
अंततः मनुष्य पूरी तरह निरपेक्ष शायद कभी नहीं हो सकता, क्योंकि वह अपने अनुभवों, संस्कारों और परिवेश का परिणाम है। किंतु वह न्यायप्रिय अवश्य हो सकता है। और यही न्यायप्रियता उसे अंधसमर्थन तथा अंधविरोध दोनों से बचाती है। किसी भी स्वस्थ समाज की सबसे बड़ी पहचान यही है कि वहाँ लोग पक्ष बदलने से नहीं, सत्य स्वीकार करने से डरते नहीं। यही लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है और यही एक जागरूक नागरिक की सबसे बड़ी पहचान भी।
सुशील शर्मा