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: भोपाल के भारत भवन में आयोजित अद्वैत जागरण शिविर- दीक्षांत समारोह में श्रद्धेय स्वामी परमानंद सरस्वती जी, श्री ब्रह्मचारिणी मैत्रेयी चैतन्य जी, श्री स्वामी समानंद गिरि जी एवं अन्य श्रद्धेय संतों तथा गणमान्य जनों के साथ सहभागिता की।

Aditi News Team

Fri, Oct 21, 2022
भोपाल के भारत भवन में आयोजित अद्वैत जागरण शिविर- दीक्षांत समारोह में श्रद्धेय स्वामी परमानंद सरस्वती जी, श्री ब्रह्मचारिणी मैत्रेयी चैतन्य जी, श्री स्वामी समानंद गिरि जी एवं अन्य श्रद्धेय संतों तथा गणमान्य जनों के साथ सहभागिता की। अद्वैत वेदांत की सबसे सरल परिभाषा महाकवि तुलसीदास जी ने की। उन्होंने लिखा कि सिय राम मय सब जग जानी, करहु प्रणाम जोरी जुग पानी।। सब कुछ तो सिया राम मय है। सृष्टि के कण-कण में वही विराजमान हैं। प्रत्येक आत्मा, परमात्मा का अंश है। हर घट में बस वही समाया है। किसी ने प्रश्न किया कि हर घट में वही है, तो दिखाई क्यों नहीं देता है। इसका बहुत अच्छा उत्तर कबीरदास जी ने दिया है कि साहिब तेरी साहिबी, सब घट रही समाय ज्यों मेहंदी के पात में, लाली लखी न जाय। हर घट में वही समाया हुआ है, लेकिन जब तक साधना की चक्की में मनुष्य स्वयं को न पीसे, तब तक ईश्वर का साक्षात्कार संभव नहीं है। भारत ने सभी विचारों का स्वागत किया। किसी ने कहा कि ईश्वर साकार है, तो किसी ने कहा कि वह निराकार है। भारत ने ऋषि चार्वाक के 'यावज्जीवेत्सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्। भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः।।' के विचार को भी स्वीकार किया। भगवान श्रीराम ने भारत को उत्तर व दक्षिण और भगवान श्रीकृष्ण ने पूरब व पश्चिम को जोड़ा, लेकिन आदिगुरु शंकराचार्य ने तो भारत के पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण को सांस्कृतिक एकता के एक सूत्र में बांध दिया। भौतिकता की अग्नि में दग्ध विश्व मानवता को शाश्वत शांति के पथ का दिग्दर्शन करायेगा, तो यही अद्वैत दर्शन करायेगा, लेकिन इसको हमें व्यावहारिक रूप में धारण करना होगा और इसका प्रचार-प्रसार भी करना होगा। मैं भी वही हूं और तू भी वही है, इसका बोध हो जाता है, तो सारी उठापटक शांत हो जाती है। द्वैत मिट जाता है। फिर मनुष्य उसको जान लेता है, जिसको जानने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रहा जाता है। आप अद्भुत जीवन जी सकते हैं, कल की परवाह किये बिना, जो अपना कर्तव्य है, उसको पूरा करो। अद्वैत को साकार करते हुए जीवन जीओ, परमानंद की प्राप्ति होगी।

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