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परिस्थितियां नहीं, उनके सामने हमारी मानसिक स्थिति ही असली चुनौती

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मुनि श्री समतासागर जी महाराज : परिस्थितियां नहीं, उनके सामने हमारी मानसिक स्थिति ही असली चुनौती

Aditi News Team

Sun, Sep 6, 2026

परिस्थितियां नहीं, उनके सामने हमारी मानसिक स्थिति ही असली चुनौती

मुनि श्री समतासागर जी महाराज

कुण्डलपुर(म.प्र.)। निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने प्रातःकाल बड़े बाबा भगवान श्री आदिनाथ के चरणों में बैठकर शांतिधारा संपन्न कराई। इस अवसर पर देशभर से श्रद्धालु कुण्डलपुर तीर्थ क्षेत्र पहुंचे। उपरोक्त जानकारी देते हुए राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं कुण्डलपुर क्षेत्र प्रचार मंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि मुनिश्री के सान्निध्य में श्रद्धालुओं ने भगवान श्री आदिनाथ जी की आराधना की। मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने ‘What Is Life’ लाइव सीरीज के अंतर्गत ‘Life is a Challenge’ विषय पर जीवन की चुनौतियों को आध्यात्मिक दृष्टि से समझाते हुए कहा कि परिस्थितियां अपने आप में चुनौती नहीं होतीं, बल्कि परिस्थितियों के सामने हमारी बदली हुई मानसिक स्थिति ही असली चुनौती है। चुनौती को स्वीकार करने का अर्थ है बिना विरोध के उसे तटस्थता और साम्यभाव के साथ आत्मसात करना। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति किसी कार्यक्रम के लिए निकला और अचानक तेज बारिश आ गई तो बारिश पर गुस्सा करना या किस्मत को कोसना मानसिक विरोध है। इसके विपरीत बारिश को सहजता से स्वीकार कर छाता उठाकर आगे बढ़ जाना स्वीकार भाव है। परिस्थिति वही रहती है, लेकिन उसके प्रति हमारी प्रतिक्रिया बदल जाती है। मुनिश्री ने कहा कि जीवन की सबसे बड़ी बाधाओं में एक भ्रमजाल है। मकड़ी दूसरों को फंसाने के लिए जाल बुनती है, लेकिन अंततः स्वयं उसी जाल में उलझ जाती है। इसी प्रकार मनुष्य अपनी कमजोरियों को छिपाने के लिए दोषारोपण और अहंकार के धागों से भ्रमजाल बुनता है और अंत में उसी में फंस जाता है। असफलता आने पर वह बॉस, किस्मत, माता-पिता या परिस्थितियों को दोष देता है, लेकिन अपनी जिम्मेदारी पर विचार नहीं करता। उन्होंने कहा कि दोषारोपण के साथ अहंकार जुड़ जाए तो व्यक्ति परिवार, मित्रता और करियर तक को नुकसान पहुंचा सकता है। इसका परिणाम मानसिक थकान, एंग्जायटी, बर्नआउट, निराशा और हताशा के रूप में सामने आता है। इस भ्रमजाल को तोड़ना ही वास्तविक चुनौती है। मुनिश्री ने इसका मंत्र बताते हुए कहा—“शत-प्रतिशत जिम्मेदारी स्वीकार करो।” जीवन में जहां प्रगति रुकी है, वहां दूसरों की ओर उंगली उठाने के बजाय अपनी भूमिका देखनी चाहिए। दूसरे को दोष देने से समाधान नहीं मिलेगा। अपने स्किल सेट और माइंडसेट को सुधारना ही आगे बढ़ने का वास्तविक रास्ता है।जैन दर्शन के निमित्त-नैमित्तिक सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि परिस्थितियां केवल निमित्त अथवा माध्यम हैं। सुख-दुख का वास्तविक कारण व्यक्ति का अपना उपादान और उसकी योग्यता है। निमित्त कोई भी बन सकता है, लेकिन उसका प्रभाव तभी पड़ता है जब हम उससे प्रभावित होते हैं। जागरूक व्यक्ति समता भाव से परिस्थिति को देखता है और उसके प्रभाव को अपने ऊपर हावी नहीं होने देता।उन्होंने कहा कि अच्छे कार्य में कोई निमित्त बने तो उसके प्रति धन्यवाद और आभार व्यक्त कर आगे बढ़ जाना चाहिए। वहीं विपरीत परिस्थिति में किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के बजाय अपने कर्मों के प्रभाव को समझना चाहिए। यह दृष्टि व्यक्ति को द्वेष और शिकायत से मुक्त करती है।मुनिश्री ने कहा कि जैन दर्शन के अनुसार जीवन की वास्तविक चुनौती भेदविज्ञान है। मनुष्य अपनी असली पहचान को भूलकर शरीर, पद, धन, व्यवसाय और रिश्तों को ही अपना स्वरूप मान लेता है। ‘मैं इंजीनियर हूं’, ‘मैं अमीर हूं’, ‘यह मेरा घर है’ जैसी बाहरी पहचानें धीरे-धीरे अहंकार और मोह का कारण बन जाती हैं। शरीर, धन और रिश्ते परिवर्तनशील हैं, जबकि आत्मा का स्वरूप स्थायी है। इस अंतर को समझना ही भेदविज्ञान है। उन्होंने आचार्य श्री के वचन स्मरण करते हुए कहा—“उस पथ की क्या परीक्षा, पथ में शूल न हो; उस नाविक की क्या परीक्षा, धारा प्रतिकूल न हो।” अनुकूल परिस्थितियों में समता रखना आसान है, लेकिन प्रतिकूलता के बीच समता बनाए रखना ही जीवन की वास्तविक परीक्षा है। चुनौती आने पर मैदान छोड़कर भागना नहीं, बल्कि साहस के साथ उसका सामना करना चाहिए।मुनिश्री ने अपने गुरुवर आचार्यश्री के जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने जीवन में आई विभिन्न चुनौतियों का सामना धैर्य और जागरूकता से किया। संलेखना समाधिमरण के अंतिम समय में भी शरीर की प्रतिकूलताओं और श्वास की कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने साधना के मार्ग से कोई समझौता नहीं किया। मुनिश्री ने कहा कि उन्होंने गुरुवर के अंतिम क्षणों को निकट से देखा, जहां उनकी अप्रमत्तता और चेतना की जाग्रति अंतिम समय तक बनी रही। उन्होंने कहा कि आज का मनुष्य पूरी दुनिया को अपने नियंत्रण में रखना चाहता है, लेकिन अपने मन को नियंत्रित नहीं कर पाता। यही पहचान का संकट और नियंत्रण की प्रवृत्ति उसे अपने ही बनाए भ्रमजाल में फंसा देती है। जब तक मनुष्य अपने मुखौटे नहीं उतारेगा, तब तक वह बाहरी दुनिया को बदलने की कोशिश में भीतर से और उलझता जाएगा मुनिश्री ने श्रद्धालुओं से आत्मचिंतन का आह्वान करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति स्वयं से पूछे—मेरे जीवन की वास्तविक चुनौती क्या है? क्या मैं अपने ही बुने भ्रमजाल में फंसा हूं? जिस पहचान को लेकर मैं चौबीसों घंटे दौड़ रहा हूं, उसके पीछे मेरी वास्तविक पहचान क्या है?उन्होंने कहा कि विद्यार्थी, व्यापारी, गृहस्थ अथवा साधक—हर व्यक्ति की चुनौती अलग हो सकती है। चुनौती की पहचान कर उसे समता, साहस और जागरूकता के साथ स्वीकार करना ही समाधान की पहली सीढ़ी है। ‘Life is a Challenge’ का संदेश यही है कि चुनौतियों से भागें नहीं, उन्हें स्वीकार करें, साहस के साथ उनका सामना करें और समता भाव से उनके वास्तविक स्वरूप को समझते हुए अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ें।

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कुंडलपुर

अदिति न्यूज,(सतीश लमानिया)

मुनि श्री समतासागर जी महाराज

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