: क्या आप भगवान कृष्ण के पुत्र के बारे में जानते हैं जिसके कारण सम्पूर्ण यदुवंश का नाश हो गया था
Mon, Apr 21, 2025
क्या आप भगवान कृष्ण के पुत्र के बारे में जानते हैं जिसके कारण सम्पूर्ण यदुवंश का नाश हो गया था
श्री कृष्ण और उनकी दूसरी पत्नी जांबवंती के ज्येष्ठ पुत्र थे सांब जिनका विवाह दुर्योधन की पुत्री लक्ष्मणा से हुआ था। जब महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ तो गांधारी ने कृष्ण को इसका दोषी मानते हुए यदुकुल के नाश का श्राप दे दिया जिसे कृष्ण ने सहर्ष स्वीकार किया। उन्होंने ये भी कहा कि समय आने पर वे और बलराम स्वयं यदुकुल का नाश कर देंगे।हालाँकि किसी ने उस समय ये नहीं सोचा था कि कृष्ण के कुल का नाश उनके अपने पुत्र साम्ब के कारण होगा। महाभारत को समाप्त हुए 36 वर्ष बीत चुके थे। एक बार महर्षि दुर्वासा एवं अन्य ऋषि द्वारका पधारे। ऋषियों का इतना बड़ा झुण्ड देख कर साम्ब और उनके मित्रों ने उनसे ठिठोली करने की सोची।उन्होंने साम्ब को एक स्त्री के रूप में सजाया और उसका मुख ढँक कर महर्षि दुर्वासा के पास ले गए। उन्होंने महर्षि को प्रणाम कर उनसे कहा - "हे महर्षि! हमारी ये सखी गर्भवती है। आप लोग तो सर्वज्ञानी हैं अतः भविष्यवाणी कर के ये बताइये कि इसे प्रसव में पुत्र होगा अथवा पुत्री।"इस प्रकार के परिहास से सभी ऋषि बड़े दुखी हुए किन्तु इसे बालकों का बचपना समझ कर उन्होंने कुछ नहीं कहा। किन्तु महर्षि दुर्वासा जो अपने क्रोध के लिए ही जाने जाते हैं, वे अपने क्रोध पर नियंत्रण ना रख पाए। श्राप तो वैसे भी उनकी जिह्वा के नोक पर रखा रहता था। उन्होंने क्रोधित होते हुए कहा कि "रे मुर्ख! तू हमसे ठिठोली करता है? जा तेरी इस सखी के गर्भ से एक मूसल का प्रसव होगा और उसी मूसल से समस्त यदुकुल का नाश हो जाएगा।"महर्षि दुर्वासा का ये श्राप सुनकर सभी लोग भय के मारे वहाँ से भाग निकले। अभी वे थोड़ी ही दूर गए थे कि साम्ब को प्रसव पीड़ा शुरू हो गयी और उसने वही मार्ग में एक विशाल मूसल को उत्पन्न किया। सभी अत्यंत भयभीत हो उस मूसल को लेकर श्रीकृष्ण के पास पहुँचे और उन्हें सारी घटनाएँ सच-सच बता दी।जब कृष्ण और बलराम ने ऐसा सुना तो अत्यंत दुखी हुए। कृष्ण समझ गए कि यदुकुल के नाश और उनके और बलराम के निर्वाण का समय आ पहुँचा है। जब महाराज उग्रसेन ने ये सुना तो उन्होंने आज्ञा दी कि इस मूसल को चूर्ण कर समुद्र किनारे फिकवा दिया जाये ताकि इससे किसी प्रकार का खतरा ना रहे।कृष्ण तो सब जानते ही थे किन्तु उन्होंने कुछ कहा नहीं। उग्रसेन की आज्ञानुसार उस मूसल को चूर्ण कर समुद्र किनारे फिकवा दिया गया। उस चूर्ण से मनुष्यों की ऊँचाई जितनी घास उग आई और थोड़े दिनों में लोग इस बात को भूल गए। कुछ समय बाद प्रभासतीर्थ के उत्सव हेतु समस्त यादवगण समुद्र के किनारे इकट्ठे हुए।वहाँ वाद-विवाद करते हुए वे सभी मदिरा का पान करने लगे। कृष्ण और बलराम ने उन्हें बहुत समझाया किन्तु किसी ने उनकी एक ना सुनी। दोनों समझ गए कि दैवयोग आ चुका है इसी कारण वे दोनों उस भीड़ से अलग जाकर बैठ गए।मदिरा के मद में सात्यिकी ने कृतवर्मा का मजाक उड़ाते हुए कहा - "ये देखो, ये वो महानुभाव हैं जो महाभारत के युद्ध में कौरवों की ओर से लड़े थे। और तो और, ये इतने बड़े महारथी हैं कि रात्रि के अँधेरे में छलपूर्वक इन्होने उप पांडवों के वध में अश्वथामा का साथ दिया। इसपर भी आज ये निर्लज्ज की भांति यहाँ हमारे समक्ष बैठे हैं।"सात्यिकी के इस प्रकार कहने पर वहाँ उपस्थित यादव कृतवर्मा पर हँसने लगे। ऐसा देख कर कृतवर्मा स्वयं को अत्यंत अपमानित महसूस करने लगे। उन्होंने क्रोध में कहा - "रे क्लीव! तू मेरी वीरता की क्या बात करता है? तेरी वीरता भी तो जग जाहिर है। तूने भूरिश्रवा का छल से वध किया। अगर ऐसा ना होता तो तू कब का नर्क सिधार गया होता।"कृतवर्मा के ऐसा कहने पर अब यादव सात्यिकी पर हँसने लगे। तब सात्यिकी ने क्रोध में कहा - "हे नराधम! वो तू ही तो है जो सत्राजित का वध करना चाहता था।" ये सुनकर कि कृतवर्मा उनके पिता का वध करना चाहता था, सत्यभामा रोते-रोते कृष्ण के पास पहुँची।स्थिति बिगड़ते देख कृष्ण और बलराम तुरंत वहाँ पहुँचे। इसी बीच क्रोधित हो कृतवर्मा ने फिर सात्यिकी को धिक्कारते हुए कहा - "रे अधम! महाभारत युद्ध के पाँचवे दिन तेरे समक्ष ही भूरिश्रवा ने तेरे 10 पुत्रों का वध कर डाला। जो अपने पुत्रों की रक्षा ना कर सका वो वीरता की बात किस प्रकार करता है?"इस प्रकार अपमानित होने पर सात्यिकी ने क्रोध में बिना कुछ सोचे अपनी खड्ग से कृतवर्मा का सर काट डाला। कृतवर्मा के इस प्रकार मारे जाने पर वहाँ हाहाकार मच गया। तुरंत ही वहाँ के सभी यादव वीर कृतवर्मा और सात्यिकी इन दो गुटों में बंट गए। कृतवर्मा की हत्या पर भोजराज और अंधक कुल के राजा ने सात्यिकी पर आक्रमण कर दिया।ऐसा देख कर कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न उन्हें बचाने युद्ध में कूद पड़े। बात ही बात में कृष्ण और बलराम के समक्ष ही वहाँ यादवों के बीच भयानक युद्ध छिड़ गया। किसी के पास अस्त्र-शस्त्र तो थे नहीं तो सभी ने वही उगी घास उखाड़-उखाड़ कर एक दूसरे को मारना शुरू कर दिया। दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण उन घासों से सहस्त्रों मूसल पैदा हो गए और उसी से सब एक दूसरे का नाश करने लगे।जब कृष्ण और बलराम ने ऐसा देखा तो मारे दुःख और क्रोध के स्वयं उसी घास से सबका वध करना आरम्भ कर दिया। देखते ही देखते कृष्ण और बलराम को छोड़कर समस्त यादव कुल का नाश हो गया। यहाँ तक कि कृष्ण और बलराम के सभी पुत्र भी काल को प्राप्त हो गए।इसके बाद दुखी बलराम ने स्वयं जल-समाधि ले ली और कृष्ण अकेले वन में जाकर एक वृक्ष के नीचे लेट गए जहाँ जरा नामक शिकारी ने अज्ञानता में उनके चरणों में बाण से प्रहार कर दिया। इसके बाद श्रीकृष्ण ने भी अपने प्राण त्याग दिए।
जय श्री कृष्ण
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बहोरीवंद
आज का वर्तमान समाज विज्ञान की प्रगति के चमत्कार को देखकर चमत्कृत है परिथ फल का आकाशी है विज्ञान व्रत एक विद्युत बल्ब की प्रकाश यात्रा पर विचार करें तो प्रथम एक सच्चाई यह है कि वायर मी खंबा केवल लाइन सब स्टेशन फिर विद्युत की दूर तक की यात्रा पश्चातज हां से सप्लाई होती है वहां पर भी अनेकों संयंत्र एक बल्ब के पीछे की प्रकाश व्यवस्था में अनेकों कारणो के पश्चात एक बल्ब प्रकाशित होता हैइसके बावजूद भीयदि सप्लाई बाधित होती है तो अंधेरा ही है यह विज्ञान हैजबकि धार्मिक कार्य का प्रतिफल ऐसा नहीं है जैन आगम के अनुसार साधु का भेष द्रव्य एवं भाव दो तरह का है यदि साधु पूर्ण शुद्ध शुद्धात्म स्वभाव वाला है तो मोक्ष सुनिश्चित है मोक्ष सुनिश्चित है ऐसे हीआपके धार्मिक कार्य हैं आपका श्रद्धा विवेक समर्पण गुरु और परमात्मा की सेवाकरते हैं उससे आपको परंपरा से मोक्ष प्राप्त होगा उक्त आशय के सारगर्भित उद्गार मुनि श्री सुधासागर जी एवं मुनि श्री प्रसाद सागर जी ने बहोरीवंद मे होने वाले पंच कल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के समापन अवसर पर श्रीजी को उच्चासन पर विराजमान किया गया तत्वस्वात प्रतिष्ठाचार्य प्रदीप भैया सानिद् में 1008 कलशो से पाशाण से परमात्मा बने भगवान शानिनाथ जी का त्रिलोक तीर्थ जिनालय मे महा मस्तिकाभिषेक तथा यागमंडल विधान के समापन पर विशिष्ट पात्रो एवं सामान्य द्वारा हवन की पूर्णाहुति की गई . कार्यक्रम में प्रमुख रूप से श्रीमंत सेठ उत्तमचंद जैन कोयला अनुराग जैन प्रमोदजैन काका महेन्द्र जैन मनोज जैन प्रशांत जैन सत्येन्द्र जैन डा के एल जैन प्रशांत जैन सुरेन्द्र सिंघई विनय जैन नरेन्द्र सिंघई दिनेश जैन प्रदीप जैन पुष्पेन्द्र मोदी युवामंडल महिला मंडल के सदस्यो की बडी संख्या मे उपस्थिति रही
: ज्ञान कल्याणक पर उमडी आस्था,भगवान की आहार चर्या कराने श्रद्धालुओ की रही भीड
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ज्ञान कल्याणक पर उमडी आस्था
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बहोरीबंद
भगवान आदि कुमार छै माह पश्चात आहार के लिए निकले राजा सौम और राजा श्रेयांश ने इच्छु रस का आहार नवदा भक्ति पूर्वक पडगाहन के पश्चात दिए तभी से आज तक दान तीर्थ का प्रवर्तन निरंतर चल रहा है श्रवणो को श्रावको द्वारा आहार दान की प्रक्रिया वर्तमान में आदिनाथ के काल से आज भी निरंतर प्रवाहमान है साधुओं के रत्नत्रय के पालन में ग्रहस्तों द्वारा तप वृद्धि हेतु आहार दान दिया जाता है।पंचकल्याणक के चतुर्थ दिवस आहार की चर्या विधि नायक भगवान पर की गई आदिनाथ द्वारा असी मसी कृषि विद्या शिल्प वाणिज्य आदि 72 कलाओं का उपदेश प्रजा को दिया गया अंक और अक्षर विद्या का प्रारंभ ब्राह्मी और सुंदरी को देकर किया गया आदि कुमार आहार के पश्चात वन गमन कर गए जहां घनघोर तप करते हुए आत्म ज्ञान को प्राप्त हुए यह आत्मज्ञान केवल ज्ञान का रूप धारण कर मोक्ष प्राप्त कराएगा प्रतिष्ठा महोत्सव में सभी क्रियाएं जन समुदाय के मध्य की गई।उक्त आशय के सारगर्भित उद्गार मुनिपुंगव सुधासागर जी मुनि श्री प्रसाद सागर जी ससंघ के सानिद्ध मे भगवान के ज्ञान कल्याणक महोत्सव के पावन अवसर पर विशाल धर्मसमा मे व्यक्त किये ज्ञान कल्याणकया दिवस पर प्रातःमंदिर की प्रांगण मेंचल रहे पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव कार्यक्रम में .भगवान का अभिषेक शांति धारा पूजन एवं भगवान की आहारचार्य पडगाहन आदि के कार्यक्रम शांनंद संपन्न किए गए।