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"*"छल-कपट को छोड़कर विचार,वाणी और कर्म में एकरूपता लाएं"

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निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी ने कहा : "*"छल-कपट को छोड़कर विचार,वाणी और कर्म में एकरूपता लाएं"

Aditi News Team

Fri, Sep 18, 2026

"*"छल-कपट को छोड़कर विचार,वाणी और कर्म में एकरूपता लाएं" : निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर*

कुण्डलपुर। दशलक्षण महापर्व के तीसरे दिवस उत्तम आर्जव धर्म की आराधना के अवसर पर निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कहा कि धर्म की पाठशाला में हम केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि जीवन जीने का पाठ पढ़ रहे हैं। पहले दिन उत्तम क्षमा ने क्रोध के अवसर पर भी शांत रहने की शिक्षा दी, दूसरे दिन उत्तम मार्दव ने गुण आने पर विनम्र बनने का संदेश दिया और तीसरे दिन उत्तम आर्जव धर्म हमें सहज, सरल और निष्कपट जीवन जीने की प्रेरणा देता है। आर्जव का वास्तविक अर्थ है—विचार, वाणी और कर्म में एकरूपता।

मुनिश्री ने कहा कि क्षमा और मृदुता भी तभी धर्म बनती हैं, जब उनके पीछे सरल भाव हों। कोई व्यक्ति मजबूरी में क्षमा कर सकता है या किसी को धोखा देने के लिए मीठी वाणी और विनम्र व्यवहार अपना सकता है, लेकिन ऐसी कृत्रिमता धर्म नहीं है। जब मन में कुछ, वाणी में कुछ और व्यवहार में कुछ और हो, तो वहां आर्जव नहीं, कुटिलता है। शांति, समता और सद्भावना के साथ मन, वचन और कर्म एक दिशा में चलें, तभी सरलता धर्म का स्वरूप लेती है।

सांप के उदाहरण से उन्होंने आर्जव की व्याख्या करते हुए कहा कि संसार में सांप टेढ़ा-मेढ़ा चलता है, लेकिन जब अपने बिल में प्रवेश करता है तो एकदम सीधा हो जाता है। इसी प्रकार मनुष्य संसार में अनेक मुखौटे लगाकर चलता है।अलग-अलग परिस्थितियों में उसके अलग चेहरे दिखाई देते हैं,लेकिन जब उसे अपने आत्मा के घर में प्रवेश करना हो तो बाहर के सभी मुखौटे बाहर उतारने पड़ेंगे। आत्मा तक पहुंचने का मार्ग सीधा है, वहां छल-कपट के लिए कोई स्थान नहीं।

मुनिश्री ने "कार्तिकेयानुप्रेक्षा" ग्रंथ का आर्जव धर्म के प्रतिपादन का उल्लेख करते हुए कहा कि जो कुटिल चिंतन नहीं करता, कुटिल वचन नहीं बोलता, कुटिल आचरण नहीं करता और दूसरों के दोषों में उलझने के बजाय अपने दोषों के शुद्धीकरण का प्रयास करता है, वही आर्जव धर्म का पालन करता है। उन्होंने कहा कि धर्म को केवल शास्त्रों में खोजने की आवश्यकता नहीं है। जिस व्यवहारिक जीवन में हम प्रतिदिन छल, कपट, स्वार्थ और माया से सामना करते हैं, वहीं अपने परिणामों में धर्म पैदा करना है।

उन्होंने मकड़ी के जाल का उदाहरण देते हुए कहा कि मकड़ी सुरक्षा के लिए जाल बुनती है, लेकिन अंततः उसी जाल में उलझ जाती है। मनुष्य भी दूसरों को छलकर तत्काल लाभ प्राप्त कर सकता है, सामने वाला परेशान हो सकता है और स्वयं खुश हो सकता है, लेकिन उस छल का कर्मबंध उसके साथ ही रहता है। इसलिए जीवन में संकल्प होना चाहिए कि हमारी वजह से किसी को धोखा या कष्ट न पहुंचे। धोखा देना भी नहीं है, धोखा खाना भी नहीं है और धोखेबाजों से सावधान भी रहना है।मुनिश्री ने शिविरार्थियों को आर्जव का व्यवहारिक पाठ पढ़ाते हुए कहा कि किसी व्यवस्था में कोई कमी दिखाई दे तो कार्यकर्ताओं को कोसना उचित नहीं। कमरे की सफाई समय पर न हो, कोई व्यवस्था पूरी न हो पाए या कार्यकर्ता उपलब्ध न हो तो नाराज होने के बजाय स्वयं कुछ समय लगाकर व्यवस्था संभालनी चाहिए। इससे शिविरार्थी केवल व्यवस्था का लाभ लेने वाला नहीं, बल्कि व्यवस्था में सहयोग करने वाला कार्यकर्ता भी बनता है। अपनी बात रखनी हो तो मृदुभाषी बनकर उचित समय पर प्रेमपूर्वक सुझाव देना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज मनुष्य हर चीज का तत्काल परिणाम चाहता है। ‘फास्ट रिलीफ’ की मानसिकता धर्म में भी दिखाई देने लगी है,जबकि धर्म का उद्देश्य केवल तत्काल सुख-संपत्ति पाना नहीं,बल्कि आत्मशुद्धि है।क्षमा, मार्दव और आर्जव आत्म-संशोधन के पड़ाव हैं। मुनि श्री ने कहा कि दशलक्षण पर्व का प्रत्येक दिन इसलिए अपने भीतर एक दोष कम करने और एक सद्गुण बढ़ाने का अवसर प्रदान करता है। जैसे छोटा बच्चा सहज और सरल होता है और जैसे-जैसे उसके मन का विकास होता है,उसके अंदर अपने-पराए का भेद,स्वार्थ और माया बढ़ने लगती है। यही माया धीरे-धीरे मनुष्य को अपने ही बनाए जाल में उलझा देती है।आर्जव धर्म इसी कुटिलता से बाहर निकलकर मूल सहजता की ओर लौटने का आह्वान है।

उन्होंने कहा कि यदि जीवन में इतना सूत्र उतर जाए कि ‘किं करणीयम्, किं अकरणीयम्’—क्या करना है और क्या नहीं करना है,तो दशलक्षण धर्म का सार व्यवहार में उतर सकता है।व्यक्ति स्वयं अपने विचार, वाणी और कर्म की जांच करे और आत्म-अनुशासन विकसित करे।जो भीतर से अनुशासित हो जाता है, उसे बार-बार बाहरी निर्देशों की आवश्यकता नहीं पड़ती।

समता सरोवर के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं कुण्डलपुर तीर्थ प्रचार मंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि दशलक्षण महापर्व के दौरान कुण्डलपुर में अभिषेक, शांतिधारा, पूजन,स्वाध्याय एवं धर्म आराधना के साथ श्रद्धालु आत्मशुद्धि की साधना में जुटे हैं।शनिवार को अष्टमी के दिन जैन धर्म के नवमें तीर्थंकर भगवान पुष्पदंत जी के निर्वाण कल्याणक महोत्सव के अवसर पर निर्वाण लाडू श्रद्धाभाव से अर्पित किया जाएगा। दौपहर में तत्वार्थ सूत्र स्वाध्याय कक्षा एवं सांयकाल आचार्य भक्ति,समता समाधान, आरती, नाटिका कार्यक्रम संपन्न हुए।

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अदिति न्यूज,(सतीश लमानिया)

निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी

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